नवम्बर 30, 2020

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दशमी को कैसे करे प्रसन्न माँ दुर्गा को ?

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महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी।
दशमी को कैसे करे प्रसन्न माँ दुर्गा को ?
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नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस वर्ष अर्थात 24 अक्टूबर 2020 को दुर्गाष्टमी और महानवमी दोनों तिथियां एक साथ पड़ी है। इस त्यौहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं माता रानी के भक्त अपनों को दुर्गाष्टमी की बधाई देते हैं। 

शारदीय नवरात्री पर्व

शारदीय नवरात्रि भारत के विभिन्न प्रदेश में विविध प्रकार से मनायी जाती है। गुजरात में भी इस त्योहार को बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। 

गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा खेल कर मनाया जाता है। यह पूरी रात भर चलता है। डांडिया का अनुभव बड़ा ही विस्मर्णीय है। डांडिया और गरबा के शौक़ीन पुरे वर्ष शारदीय नवरात्री की प्रतीक्षा करते है। 

देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, ‘आरती’ से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह आरती के बाद किया जाता है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का बहुत ही महत्व है। 

यह पश्चिम बंगाल का मुख्य त्यौहार है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा माता की बड़ी बड़ी मुर्तिया बहुत ही विशाल और आकर्सक पंडालों में सजाई जाती है।  

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पश्चिम बंगाल और गुजरात में शारदीय नवरात्री उतने ही धूम धाम से मनाई जाती है जैसे की मुंबई जैसे बड़े शहर में गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। इस अदभुत त्यौहार का जश्न भारत के नीचले प्रदेशो जैसे की दक्षिण में मैसूर के राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है।

नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की भक्ति और परमात्मा की शक्ति की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा समय माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही  है।

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नवरात्रि में देवी के शक्तिपीठ और सिद्धपीठों पर भारी मेले लगते हैं । माता के सभी शक्तिपीठों का महत्व अलग-अलग प्रकार से हैं। लेकिन प्रत्येक जगह भले ही माता का नाम अलग हो लेकिन उनका स्वरूप एक ही है।

जैसे की जम्मू कटरा के पास वैष्णो देवी बन जाती है। तो कहीं पर चामुंडा रूप में पूजी जाती है। बिलासपुर हिमाचल प्रदेश मे नैना देवी नाम से माता के मेले लगते हैं तो वहीं सहारनपुर में शाकुंभरी देवी के नाम से माता का भारी मेला लगता है।

नौ दिन माता रानी की पूजा

शक्ति स्वरूपणी माता की पूजा नौ दिन तक विभिन्न रूप से की जाती है।

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नवरात्रि के पहले तीन दिन

नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। यह पूजा ऊर्जा और शक्ति स्वरूपणी माता की की जाती है। प्रत्येक दिन की पूजा माँ दुर्गा के एक अलग स्वरुप को समर्पित है।

नवरात्रि का चौथा से छठ्ठा दिन

नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा की जाती है। जब व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब भी सच्चे ज्ञान से वंचित रहता है। ज्

ञान प्रत्येक मानव जीवन के लिए आवश्यक है फिर भले हि वह मानव सत्ता और धन से समृद्ध हो। इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।

नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन

सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। ज्ञान और आध्यात्म को प्राप्त करने के लिए माता रानी की पूजा की जाती हैं। आठवे दिन पर एक ‘यज्ञ’ किया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा को विदा किया जाता है।

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नवरात्रि का नौवां दिन

नौवा दिन नवरात्रि का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन किया जाता है। जिसमें नौ कुंवारी कन्याओं की पूजा की जाती है। इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक मानकर श्रद्धालु भोज चढ़ाते  है। कन्याओं का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में कन्याओं को उपहार के रूप में नए कपड़े प्रदान किए जाते हैं।

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ऐसे में लोग आज के दिन दुर्गाष्टमी भी मना रहे हैं। आज के दिन लोग अपने घर कंजक पूजते हैं यानी घर में कन्याओं को बुलाकर उन्हें देवी की तरह प्रसाद खिलाया जाता है। इसे कन्या पूजन कहते हैं। 

कन्या पूजन दुर्गाष्टमी और महानवमी दोनों दिन किया जाता है। ऐसा करने से मां के नौ स्वरूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री प्रसन्न हो जाती हैं और व्यक्ति पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं

माँ के स्वरुप

  • शैलपुत्री – इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
  • ब्रह्मचारिणी – इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
  • चंद्रघंटा – इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
  • कूष्माण्डा – इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
  • स्कंदमाता – इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
  • कात्यायनी – इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
  • कालरात्रि – इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
  • महागौरी – इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
  • सिद्धिदात्री – इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।

इस वर्ष दुर्गा पूजा का योग

सूर्योदयकाल में अष्टमी तिथि उपलब्ध हो तो उस नवमी से युक्त अष्टमी में ही दुर्गाष्टमी का पर्व मनाना चाहिए। 

अष्टमी यदि सप्तमी से लेशमात्र भी स्पर्श हो तो उसे त्याग देना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्र का नाश, पुत्र, पौत्र, पशुओं का नाश करने के साथ ही पिशाच योनि देने वाली होती है। 

यह जानकारी सिद्धपीठ दण्डी स्वामी तपोवन मंदिर के आचार्य पंडित सोहन वेदपाठी ने दैनिक जागरण से हुई बातचीत में दी। 

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उनका कहना है कि कुछ संस्थाएं 23 अक्टूबर को अष्टमी मनाने पर जोर दे रही हैं, जबकि इसके लिए 24 अक्टूबर का ही शुभ समय है। 

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इसलिए शुक्रवार को नहीं बल्कि शनिवार को अष्टमी मनाएं। शास्त्री ने दावा किया है कि जिन्होंने 23 अक्टूबर को अष्टमी बताई है, यह घातक है।

इस साल शारदीय नवरात्रि (Navratri) की शुरुआत 17 अक्टूबर से हो गई थी। नौ दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में भक्त मां दुर्गा के विभन्न रूपों की पूजा कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। अष्टमी व नवमी पर व्रत का परायण कर मां के शुभाशीष की कामना की जाती है।

मां भगवती के पूजन से घर में सुख-समृद्धि और शांति का संचार होता है।

विधि-विधान व श्रद्धापूर्वक किए गए पूजन के बाद मां अपने भक्तों को सदैव सुखी व संपन्न रहने का आशीर्वाद देती हैं। दुर्गाष्टमी को लेकर कई लोक कथाएं प्रचलित हैं।

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पौराणिक कथा 1

 भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर ने नवरात्रि के दुर्गाष्टमी और नवमी की पूजा के बारे में आपस में चर्चा की थी। इसका वर्णन हमारे पुराणों में भी है।

पौराणिक कथा 2

देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया था।

असुर को  वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता होने लगी कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करने लगेगा ,और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया

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और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए थे और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा था ।

देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था।

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महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।

इसे बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।

पौराणिक कथा 3

लंका-युद्ध में ब्रह्माजी ने श्रीराम से रावण वध के लिए शक्ति स्वरूपणी माँ चंडी की पूजन कर देवी को प्रसन्न करने को कहा और ब्रह्मा जी के बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल की व्यवस्था की गई।

वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ प्रारंभ किया। यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्री राम के पास पहुँचा दी और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासभंव पूर्ण किया जाए।

रावण ने अपनी मायावी शक्ति से एक नीलकमल गायब करवा दिया और इस काण्ड से श्री राम का संकल्प टूटता-सा नजर आने लगा। भय इस बात का था कि देवी माँ रुष्ट न हो जाएँ।

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दुर्लभ नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव थी, तब भगवान राम को सहज ही स्मरण हुआ कि मुझे लोग ‘कमलनयन नवकंच लोचन’ कहते हैं, तो क्यों न संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाए और प्रभु राम जैसे ही तूणीर से एक बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए, तब देवी ने प्रकट ह हुई , हाथ पकड़कर कहा- राम मैं प्रसन्न हूँ और विजयश्री का आशीर्वाद दिया।

वहीं हनुमान जी रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धर कर जुट गए। निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मणों ने हनुमानजी से वर माँगने को कहा।

इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा- प्रभु, आप प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं, उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दीजिए। ब्राह्मण इस रहस्य को समझ नहीं सके और तथास्तु कह दिया।

मंत्र में जयादेवी… भूर्तिहरिणी में ‘ह’ के स्थान पर ‘क’ उच्चारित करें, यही मेरी इच्छा है।[6] भूर्तिहरिणी यानी कि प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘करिणी’ का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली, जिससे देवी रुष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश करवा दिया। हनुमानजी महाराज ने श्लोक में ‘ह’ की जगह ‘क’ करवाकर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी।

माँ को प्रस्नन्न करने के लिए मंत्र

मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु शांति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

इस मंत्र का 11 बार जाप करें.

  • माँ शैलपुत्री
    ध्यान मंत्र: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
  • माँ ब्रह्मचारिणी
    ध्यान मंत्र: दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
  • माँ चंद्रघंटा
    ध्यान मंत्र: पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसीदम तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
  • माँ कुशमुंडा
    ध्यान मंत्र: वन्दे वांछित कामार्थे चंद्रार्घ्कृत शेखराम, सिंहरुढ़ा अष्टभुजा कुष्मांडा यशस्वनिम।।
  • माँ स्कन्द
    ध्यान मंत्र: “सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
  • माँ कात्यायिनी
    ध्यान मंत्र: स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
  • माँ कालरात्रि
    ध्यान मंत्र:करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
  • माँ गौरी
    ध्यान मंत्र: पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
  • माँ सिद्धिधात्री
  • ध्यान मंत्र: स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

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