दिसम्बर 5, 2020

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Rafale Fighter Jets Failed To Compete In International Arms Markets?

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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में राफेल(Rafale Fighter Jets) सबसे महंगे विमानों में से एक है। भारत ने 36 जेट विमानों का सौदा लगभग 60,000 करोड़ रु में किया है।

राफेल का उत्पादन F-18, MiG-29 or F-35 की प्रतिस्पर्धा (competition) में किया जा रहा है लेकिन यह अर्थव्यवस्था के पैमाने पर अधिक लाभान्वित नहीं है। राफेल ने अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में सबसे खराब प्रदर्शन कीया है।

भारत राफेल जेट(Rafale Jets) के आगमन का जश्न मना रहा है, सैन्य विशेषज्ञों ने न केवल अमेरिकी विमानों के खिलाफ इसकी क्षमताओं पर सवाल उठाया है, बल्कि यह भी सवाल उठाया है कि राफेल जेट अंतर्राष्ट्रीय हथियारों के बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने में विफल क्यों हो रहे है और अधिकांश देशों द्वारा नकार जा रहै है।

विशेषज्ञों का तर्क है कि उच्च लागत होने की वजह से कई कारण सामने आये है जैसे की देश के रक्षा क्षेत्र में अक्षमता होना।

Dassault Aviation, Boeing and Saab were the front-runners For The Indian Air Force’s Multi-Billion Dollar Contract For 126 Fighter Jets

डसॉल्ट की राफेल भारत की एकमात्र पसंद नहीं थी क्योंकि MMRCA के टेंडर में बहुत से वैश्विक विमान निर्माताओं ने आवेदन व्यक्त किया था। छह जाने माने विमान निर्माताओं ने 126 जेट विमानों का ठेका (CONTRACT) हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा की थी, यह सौदा भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना गया था।

टेंडर में शुरुआती बोली लगाने वालों में लॉकहीड मार्टिन F16 बोइंग का F/A18S, यूरोफाइटर टाइफून, रूस का मिग -35, स्वीडन का साब ग्रिपेन(Saa Gripen) और डसॉल्ट का राफेल (Rafale Fighter Jets) शामिल था। सभी विमानों का भारतीय वायुसेना द्वारा परीक्षण किया गया था और बोलियों पर सावधानीपूर्वक विश्लेषण के बाद उनमें से दो विमान – यूरोफाइटर टाइफून और डसॉल्ट राफेल को शॉर्टलिस्ट किया गया था।

डसॉल्ट ने 126 लड़ाकू जेट उपलब्ध कराने का कोंट्रेक्ट् (Contract) प्राप्त किया क्योंकि यह सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी में से एक था और विमान का maintanance अन्य विमानों की तुलना मे बहुत ही सरल है।

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राफेल के कोंट्रेक्ट् (Contract) को जीतने के बाद, भारतीय पक्ष और डसॉल्ट कंपनी ने इस बारे में 2012 में बातचीत करना शुरू कीया। हालांकि प्रारंभ में 126 जेट खरीदने की योजना थी, लेकिन भारत ने इसे घटा कर 36 कर दिया। यह सभी विमानों का सौदा fly-away (उड़ान की जा सके एसी स्तिथि) में किया गया था।

No Buyers For Rafale?

विशाल परीक्षण और बोली प्रक्रिया के बाद भारत द्वारा चुनी गई फ्रांसीसी मूल के जेट विमानों को कोई खरीददार नही मिल रहा। फ्रांस और भारत के बाद, केवल कतर और मिस्र ही राफेल जेट का उपयोग कर रहे हैं और वह भी बहुत सीमित संख्या में।

यूरेशियन टाइम्स ने बताया की, रूसी विमान विशेषज्ञों (aviation experts) ने दावा किया था कि राफेल जेट चीनी एयरफोर्स (PLAAF) के खिलाफ किसी काम के नहीं हैं। राफेल जेट की अधिकतम गति Mach 1.8 है जबकि चीनी J16s की अधिकतम गति Mach 2.2 है।

राफेल की व्यावहारिक छत (practical ceiling) J-16s से भी कम है। चीनी J-16s उर्फ रूसी Su-35s इंजन का थ्रस्ट (Thrust) भी फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों रफाल से कहीं बेहतर हैं। रूसी विशेषज्ञ ने दावा किया है की, यदि भारतीय वायु सेना (IAF) चीन की सीमा पर, खरीदे गए सभी 36 विमानों को तैनात कर दे तब भी, चीन के विमानों की तकनीकी श्रेष्ठता का सामना नही कर सकता।

विश्लेषक राफेल(Rafale Fighter Jets) के बारे में मानते हैं कि बहुत ही हल्के अनपेक्षित एयरफ्रेम और उच्च लागत इसे सफल नही होने दे रहे। जिसका अर्थ है कि उच्च High-end लड़ाकू विमानों की तलाश करने वाले देश एक दिन भारी और अधिक क्षमता की विमान जैसे की F-15 या Su-35 खरीदने का विचार कर सकते है।

जबकि सस्ते माध्यम या हल्के लड़ाकू विमान की आशंका रखने वाले F-16V, F-18E या MiG-35 जैसे अधिक लागत वाले विमान का विचार कर सकते है।

ई.सन 2000 के दशक में दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने राफेल की जगह F-15 विमान का चयन किया था। 2015 में, मिस्र ने फ्रांस के साथ एक व्यापक हथियार समझौते के तहत 12 अधिक विकल्प के साथ 24 जेट विमान खरीदे थे।

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विश्लेषकों के अनुसार, विमान की कीमत बहुत ही कम रखी गई है और अधिकांश देश तकनीकी श्रेष्ठता के कारण न केवल अमेरिकी जेट खरीदना पसंद करते हैं बल्कि फ्रांसीसीयों के बजाय अमेरिकियों को खुश करना चाहते हैं। राफेल अपनी प्रशंशाओं के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लड़ाई हार चुका है।

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